Friday, August 24, 2018

सुनाते हैं आज वो दास्ताँ

सुनाते हैं आज वो दास्ताँ जो आज तक किसी ने सुनाई नही है,
मोहब्बत तो सबने की है, पर वजह किसी ने बताई नही है,

क्यों पागल हुई जा रही है दुनिया इसके पीछे,
पता सबको है इस मर्ज की दवा किसी ने बनाई नही है,

जो पागल हुआ था इश्क में उसने इतना तो ज़रूर कहा था,
एक बार तो नज़र मिली थी दोबारा आज तक मिलाई नही है,

ओर शाहजहां ने ताजमहल बना कर कोई अहसान नही कर दिया हम पर,
एक ही मुमताज़ जहां में, दूजी आज तक आयी नही है,

मुझे आज भी याद हैं उसकी वो नीली आंखें,
दूजी आज तक इन आँखों में समाइ नही है,

अब जब मुसाफा करता हूँ किसी से तब अहसास होता है,
उस जैसी नरम कलाई खुदा ने किसी बनाई नही है,

अब जो आज हिदायत देते हैं हमें शरीफ बनने की,
कल तक इनमें से एक भी ऐसा न था जिसने मुझे पिलाई नही है,

खाक मज़ा आता है मोहब्बत में, सब कुछ तो लूट गया,
फिर न कहना वजह हमने बताई नही है

मोहब्बत सिर्फ घाटे का सौदा है, इसमें कोई कमाई नही है

अकबर

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